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लौटूँगा।' स्फटिक के मंदिर पर सूर्य की किरणें पड़ रही हैं तथा उसकी बाईं ओर की दीवार पर बकुल की शाखाओं की कम्पित छाया पड़ रही है। बचपन में जिस प्रकार यह स्फटिक-मंदिर सचेतन अनुभव होता था, इन सीढ़ियों पर बैठ कर खेलते समय सीढ़ियों में जैसा संग-साथ पाता था, आज प्रभात की सूर्य-किरणों में मंदिर को वैसा ही सचेतन, उसकी सीढ़ियों ... |
ह अच्छा नहीं लगा।
प्रहरी ने आकर सूचना दी, "पुरोहित ठाकुर का सेवक, जयसिंह भेंट करने की प्रार्थना लिए द्वार पर खड़ा है।"
राजा ने उसे आने की अनुमति प्रदान की।
जयसिंह राजा को प्रणाम करके हाथ जोड़ कर बोला, "महाराज, मैं सुदूर देश को जा रहा हूँ। आप मेरे राजा हैं, मेरे गुरु हैं, आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।"
राजा ने पूछा, "कहाँ... |
िजली के समान जयसिंह ने अचानक रात के अंधकार में से मंदिर के उजाले में प्रवेश किया। देह लंबी चादर से ढकी है, सर्वांग से बह कर बारिश की धार गिर रही है, साँस तेजी से चल रही है, चक्षु-तारकों में अग्नि-कण जल रहे हैं।
रघुपति ने उसे पकड़ कर कान के पास मुँह लाकर कहा, "लाए हो राज-रक्त?"
जयसिंह उसका हाथ छुड़ा कर ऊँचे स्वर में बोल... |
्चे की ओर एकटक देखता है, वैसे ही रघुपति ने नक्षत्र की ओर देखा। नक्षत्रराय हडबड़ा कर बोला, "नहीं, मैं नहीं हूँ।" परन्तु किसी भी तरह रघुपति की मुट्ठी नहीं छुड़ा पाया।
रघुपति ने कहा, "तो बताओ, वह कौन है?"
नक्षत्रराय ने कह डाला, "वह ध्रुव है।"
रघुपति बोला, "ध्रुव कौन?"
नक्षत्रराय, "वह एक बालक है..."
रघुपाई बोला, "मैं जानता... |
ारने लगा, किन्तु दीदी नहीं आई। रघुपति ने वज्र-स्वर में धमकाया। डर के मारे ध्रुव का रोना बंद हो गया। उसका रुदन केवल सिसकियों में बाहर आने लगा। चतुर्दश देव-मूर्तियाँ देखती रहीं।
गोविन्दमाणिक्य रात में स्वप्न में क्रंदन सुन कर जाग पड़े। सहसा सुना, कोई उनकी खिड़की के नीचे कातर स्वर में पुकार रहा है, "महाराज! महाराज!"
राजा ... |
ित कर दिए गए हो। तुम्हें प्रहरी मेरे राज्य के बाहर छोड़ आएँगे।"
प्रहरी रघुपति को सभा-गृह से ले जाने को तैयार हो गए। रघुपति ने उनसे कहा, "रुक जाओ।" राजा की ओर देख कर बोला, "तुम्हारा न्याय पूरा हुआ, अब मैं तुम्हारा न्याय करूँगा, ध्यान दो। चतुर्दश देवताओं की पूजा में दो रात, जो कोई रास्ते में बाहर निकलेगा, वह पुरोहित के द... |
की ओर चल पड़ा।
जब तक राजमहल पहुँचा, तब तक भारतवर्ष में हल्ला मच चुका था। समाचार फैल गया कि शाहजहाँ मृत्यु-शैया पर लेटे हैं। इस समाचार को पाते ही शुजा सेना सहित दिल्ली की ओर दौड़ पड़ा। सम्राट के चारों ही पुत्र मृत्यून्मुखी शाहाजहाँ के सिर से एकदम झपट्टा मार कर मुकुट उड़ा लेने की तैयारी कर रहे हैं।
ब्राह्मण तत्काल अराजक ... |
ी शाखाओं से सैकड़ों-सैकड़ों जटाएँ और लंगूरों की पूँछें झूल रही हैं। भग्न मंदिर का प्रांगण शेफाली के सफेद-सफेद फूलों और लंगूरों के दाँतों की चमक से पूरी तरह ढका है। शाम को बड़े-बड़े छतनार पेड़ों पर झुण्ड के झुण्ड तोतों के शोर से घना अंधकार मानो दीर्ण-विदीर्ण होता रहता है। आज इस विशाल जंगल में लगभग बीस हजार सैनिकों ने प्... |
त विजयगढ़ के अधिपति विक्रम सिंह के पास गया था। विक्रम सिंह ने उसी दूत से कहलवा भेजा, "मैं केवल दिल्लीश्वर शाहजहाँ और जगदीश्वर भवानीपति को जानता हूँ - शुजा कौन है? मैं उसे नहीं जानता।"
शुजा ने जड़ता भरे स्वर में कहा, "बड़ा बेअदब है! नाहक फिर लड़ाई करनी पड़ेगी। भारी झमेला है।"
रघुपति ने यह सब सुन लिया। सैनिकों के हाथ से ... |
रत्याशा नहीं की जा सकती। दिमाग की पूरी तरह कमी है। ठाकुर का आगमन कहाँ से हो रहा है?"
रघुपति ने कहा, "त्रिपुरा की राजबाड़ी से।"
विजयगढ़ के बाहर स्थित भूगोल अथवा इतिहास के सम्बन्ध में चाचा साहब की साधारण-सी जानकारी थी। भारतवर्ष में विजयगढ़ के अतिरिक्त और कुछ जानने लायक है, उन्हें यह विश्वास भी नहीं है।
पूरी तरह अनुमान के... |
विक रूप से संदेह हो ही सकता है। विदेशी की आँखों में त्रिपुरा के दुर्ग के सामने विजयगढ़ किसी अंश में हीन हो जाए, यह चाचा साहब के लिए असहनीय है।
उन्होंने कहा, "ठाकुर, सोचता हूँ, आप त्रिपुरा से बहुत दूर हैं और आप ब्राह्मण हैं, आपका एकमात्र काम देवा-सेवा ही है, आपके द्वारा कोई बात खुलने की संभावना नहीं है।"
रघुपति ने कहा, ... |
माया को आशीष जी के साथ भेजकर त्रिधा भी अपना हैंड बैग उठाकर वापस हॉस्टल की तरफ लौट रही थी और तभी दो हाथों ने पीछे से आकर उसकी आंखें बंद कर ली त्रिधा ने तुरंत उन हाथों को अपनी आंखों से हटाया और पीछे पलट कर देखा तो सामने संध्या खड़ी थी और जोर जोर से हंस रही थी त्रिधा ने संध्या को घूर कर देखा और बोली - "तुमने तो मुझे डरा ह... |
हे मगर फिर संध्या घर जाने के लिए कहने लगी क्योंकि उसे देर हो रही थी।
हर्षवर्धन अपने हाथों में एक बड़ा सा गिफ्ट रैप लेकर आया। हर्षवर्धन का गिफ्ट देखकर प्रभात और संध्या के साथ-साथ त्रिधा भी हैरानी से उसे ही देख रही थी।
हर्षवर्धन ने त्रिधा को जब गिफ्ट थमाया तो उसे छूकर भी त्रिधा को कुछ समझ नहीं आया कि यह क्या है। हर्षवर्ध... |
षवर्धन बोला - "अरे पागल हो क्या? मुसीबतों का जन्मदिन कौन मनाना चाहता है? तुम मेरी जिंदगी में किसी मुसीबत से कम हो क्या? न साथ हो न दूर हो।"
त्रिधा हंस पड़ी और बोली - "बात मत बदलो... तुम्हारे अलावा कौन याद रखता कि मेरा जन्मदिन कब पड़ता है?"
हर्षवर्धन थोड़ा गंभीर होकर बोला - "भूल गईं त्रिधा आज संध्या ने क्या कहा था? दोस्... |
प्यार होता है उसे तकलीफ भी नहीं पहुंचाते। तुमने हमेशा मुझे प्यार दिया और मैं तुम्हें सिवाय तकलीफों के कुछ नहीं दे पाई।"
हर्षवर्धन त्रिधा के हाथ को अपने हाथों में लेकर मुस्कुराते हुए बोला - "आज तुमने माना तो सही कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो। इतना मत सोचो त्रिधा, यह तुम्हारी कॉलेज लाइफ है, इसे एंजॉय करो। मेरे साथ तो तुम... |
ा लेकर प्रभात के घर जाने के लिए निकलने लगी। शाम को प्रभात के घर डिनर करने के बाद वह वापस हॉस्टल जाने वाली थी। संध्या, त्रिधा को घर से बाहर तक छोड़ने आई थी। त्रिधा को जाते देखकर संध्या ने उसे कसकर गले लगा लिया और उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर बोली - "इस एक साल में हमारे बीच बहुत कुछ सही नहीं रहा त्रिधा, हमारी दोस्ती... |
नो... मेरे सबसे अच्छे दोस्त बनने के लिए थैंक्स और सुनो... ऐसे ही अकडू खडूस रहना हमेशा और सुनो सुनो... संध्या के पागलपन को झेलना सीखो अब।"
प्रभात मुस्कुरा दिया और त्रिधा के सिर पर हाथ रख कर बोला - "मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनने के लिए तुम्हारा शुक्रिया त्रिधा।"
त्रिधा प्रभात बाय कहकर निकल गई। बाहर रोड पर काफी अंधेरा था, रो... |
थोड़ा सा बायें! थोड़ा सा दाये! मुस्कुराइये! बहुत अच्छा। बहुत अच्छा! हाँ सही है।
दूल्हा बनने की तैयारी हो गई?
अरे यार।
घोड़ी नहीं सूली चढ़ेगा भाई।
क्या बोल रहा है यार ये।
शादी में ऐसा होता है यार।
अरे बड़ा मज़ा आने वाला है।
अरे ये तो जान छुड़ा के भाग गया।
क्या बड़ी मम्मी! अंदर कोई है क्या?
अरे हाँ बेटा द... |
ों अकेलेपन से परेशानी होने लगी?
तूने किसी को पकड़ा है ना?
नहीं! पटाया है कि नहीं बता सच?
अरे नहीं! स्कूल में है ना?
सच सच बोल! अरे नहीं।
तेरी टीचर को बताऊंगी मैं! नहीं! पापा को भी बताउंगी! अरे?
बता! झूठी! अरे! झूठी, बॉयफ्रेंड है क्या! ध्रुव ये सही नहीं था।
थोड़ा सा ही पानी था यार पूरा पानी पी गया यार... |
े कुछ चाहने के लिये मैं ग़लत नहीं हूँ इस सोच में।
छोड़ यार कुत्ते वाली भूख लग रही है, यार! सस्ता वाला बड़ा पीज़ा! क्या एक समय एक जैसी बात है, यार! दूंगा। तू टेंशन मत ले यार।
अच्छा प्रस्ताव है, मैं सोचूंगी! शुक्रिया! पीज़ा पसंद है।
क्या?
कुछ भी! सच्ची।
अरे वो दूसरा वाला कहीं बेहतर है! सर आपको ज़्यादा अच्छा... |
ारे पास।
मज़ा आ रहा है?
पता नहीं!
हाँ भईया, थोड़ा बायें।
बायें? ऐसे?
थोड़ी ठोड़ी ऊपर।
हाँ!
पता नहीं।
सही है।
मुझे भी पता नहीं है।
ये सब क्या हो रहा है? सबको देख कर लग रहा
है इनकी शादी हो रही है।
भईया एक और फोटो!
ध्रुव? बड़ा होकर शादी करेगा?
हाँ करूंगा!
किससे?
मम्मी से।
मम्मी से।
माफ़ करना बेटा बहुत... |
िससे शादी कर सकूँ!
सारी ज़िंदगी का वादा कर सकूँ।
ऐसा भी विकल्प होता है क्या?
सत्ताईस की उम्र में भी?
हां ना। क्यों नहीं होता? शादी क्यों करते
हैं हम बता?
दोस्ती, आराम, सहारा?
वो तो मेरा काजू भी दे देता है!
दे ताली!
अकेलापन नहीं लगता आपको?
अकेलापन लोगों को शादी के बाद भी होता है।
तुझे क्यों अकेलेपन से परेशानी... |
पीता नहीं!
मेरा बच्चा!
पेज ठंडे लगते हैं
इधर आओ मेरे प्यारे!
कुछ महीने बाकी हैं और कुछ भी नहीं बचा
बताने को
और छह साल पहले
नए के साथ रहने की कोशिश की
और मैं देखता हूं कि मैंने कितने पन्नों को
छोड़ दिया
लड़की मेरे उदास बेबी को ढूंढ लेगी
काव्या, कल्पक, अमे, निपुन, इन सबकी
गर्लफ्रेंड भी आ रही हैं।
और कल्पक... |
ूँ।
क्या? तुम्हें मैं वैसे पसंद नहीं जैसे हूँ?
पसंद हो। बस एकदम ऐसे ही।
अच्छा कुछ ऑफ़ है, हाँ।
बोल यार।
मुझे पहला शादी का निमंत्रण मिला जो मेरे
ख़ुद के नाम पर था।
वाह क्या बात है यार।
इसमें अच्छा क्या है? ये तो दुख की बात
है ना?
ये जैसे ज़िंदगी का नया दौर है।
ऐसे जैसे लगे कि अब तुम बड़े हो रहे हो।
कौनसा बड़... |
दो - तीन महीने तक गरिमा के पिता सुयोग्य वर की तलाश मे भटकते रहे। अन्त मे पर्याप्त भाग - दौड़ करने के उपरान्त ऐसा वर मिल ही गया, जो सुशिक्षित होने के साथ - साथ सम्पन्न घराने का रोजगाररत भी था। लड़का सरकारी नौकर है और गाँव मे इतनी जमीन - जायदाद भी इतनी है कि आज भी उसके दादा - परदादा की नम्बरदारी का डका बजता है। एक लड़की ... |
ने वाली है, जिसकी तैयारी किताबे पढ़ - पढ़कर करोगी ! अब ससुराल की परीक्षा का समय आ गया है और इसकी तैयारी तुम अपनी सग - सहेलियो के साथ बतिया कर ही भली प्रकार कर सकोगी ! वरना...! गरिमा की भाभी ने चुटकी लेते हुए कहा।
वरना क्या ?
"वरना सास के घर परीक्षा मे फेल होकर अपनी पहली कक्षा मे ही रह जाओगी ! पहली कक्षा का मतलब समझ रही... |
ाे के स्थान पर अपने भावी - जीवन की रूपरेखा तथा उसको सार्थक करने वाले उपायो की कुछ स्पष्ट - सी तथा कुछ अस्पष्ट - सी एक लम्बी सूची थी। अपने भावी जीवन के लिए एक योजना थी, जिसकी सफलता - असफलता भविष्य के अन्धकारमय गर्भ मे थी। अपनी इसी योजना को केन्द्र बिन्दु बनाकर गरिमा भाँति - भाँति की कल्पनाएँ करती हुई अनुकूल समय की प्रती... |
पानी पीना है, तो रसोईघर तक जाने का कष्ट उठाना पड़ेगा। गरिमा ने पति से निवेदन किया, किन्तु पति ने रसोईघर मे जाने का मार्ग बताकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली। दो दिन तक परिवार मे उपस्थित महिलाओ के परिहास भरे उपहास और ताने सुन - सुनकर गरिमा मे इतना साहस नही बचा था कि वह अपनी प्यास बुझाने के लिए रात मे अपने शयन - कक्ष से... |
रिमा खिन्न हो उठती थी। कई बार उसे ऐसा प्रतीत होता था कि स्त्री पर शासन करने के लिए पुरुष जाति की यह सोची - समझी रणनीति है, जिसमे वह उचित - अनुचित किये बिना एक स्त्री को प्रत्यक्षतः कुछ अधिक शक्ति प्रदान करता है, ताकि भ्रमित होकर वह अन्य स्त्रियो पर नियत्रण रख सके, जबकि वास्तिविक शक्तियो का स्वामी उस समय भी पुरुष स्वय ह... |
त के लहजे मे कहा - भैया मै तो आज सै गरिमा कू कुछ बी कहूँगी नी, चायै कुछ बी हो जाए !
क्यो ? क्या बात है ? आशुतोष ने गरिमा को कठोरतापूर्वक घूरते हुए माँ से पूछा।
का बात है, इस्सैइ बूझ ले।
माँ, साफ - साफ बताओ, क्या हुआ है ? आशुतोष ने माँ से पुनः पूछा।
तुम्हे अपनी सामर्थ्य के अनुसार नही हमारी जरुरत के अनुसार कार्य करना है... |
काव्या का पंखे से लटका हुआ देह मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था. ये किस्मत का कैसा खेल है? कौन कहां पर गलत है ? पुलिस को मिले सुसाइड नोट में स्पष्ट शब्दों में लिखा था. महीप उसके बच्चे का बाप नहीं है. वह उसे भाई मानती थी. उसे राखी बांधती थी. पर कहीं पर भी उसने बच्चे के असली पिता का जिक्र तक नहीं किया था. अपनी मृत्यु के लिए... |
य बितता गया. बेडरूम में हम साथ जाते पर वे निचे फर्श पर अपना बिस्तर बिछाते और सो जाते. हममें ज्यादा बातें नही होती थी. मैं नौकरी के लिए आवेदन कर रही थी और मुझे एक बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल गई. लेकिन मेरी पोस्टिंग एक छोटे कस्बे में हुई. मैं खुश थी कि अब मुझे इस जमघट में रहकर पति-पत्नी वाला नाटक नहीं करना होगा. एक बेडर... |
ोरी की हो. सरल बेशर्मों की तरह चलता हुआ महीप के समिप पहुंचा और दोनों अंदर चले गये. सरल की हरकत ने मुझे सोचने पर मजबुर किया कि क्या वाईक उसे यहां रूकने देना चाहिए. नहीं... नहीं... हम महीप के अच्छे और शांत स्वभाव का फायदा नहीं उठा सकते.
दूसरे दिन महीप काम पर चले जाने के बाद मैंने सरल से अपने घर से चले जाने को कहा तो वह म... |
शिकायत में से सरल का नाम कटवा दिया. जिससे सरल जेल जाने से तो बच गया लेकिन घटना के वक्त वह वहां मौजूद था इसलिए उसे फौज से निष्कासित कर दिया गया. उसका रेकार्ड अच्छा ना होने की वजह से अब उसे कही नौकरी भी नहीं मिल रही है. वह खूब शराब पीता है और अपनी पत्नी को रोज मारता है और अपनी बर्बादी के लिए उसे ही दोष देता है.
सरल की ह... |
.. ना... ना सगी नहीं. बल्कि राखी बहन है. उनके दोस्त कपील की सगी बहन और दूसरे दोस्त अकील की पत्नी. यानी एक अकेली महिला से तीन पुरूष जुड़े हुए थे. और... अब तक उनमें से दो की मौत हो चुकी थी. तिसरे मेरे पति यानी महीप जिंदा थे और अब उस महिला का आगमन महीप के घर में हो गया था.
हम तीनों को एक साथ रहते हुऐ महिना दो महिना बीत गय... |
ी तो उसके पिता ने भी उसे घर में आसरा देने से इन्कार कर दिया. तब काव्या ने महीप से मदद मांगी.
महीप उसे सीधे इस फ्लैट पर ले आया. पहले तो उन्होने उसे अपने बेडरूम में सोने को कहा और खुद बाहर हॉल में सोफे पर सोने की बात की, लेकिन वह नहीं मानी और खुद हॉल में सोने लगी. इन दो महिनों में कई बार मैंने देखा वह रोते रहती और महीप उ... |
को फांसी लगा ली थी.
काव्या के सुसाईड नोट से पुलिस ने आत्महत्या का केस बनाकर फाईल बंद कर दी. तलाक के लिए एक महिना और बचा था. तलाक की एक वजह पंखे से लटककर खत्म हो चुकी थी, महीप का बच्चे से लगाव बढ़ने लगा था. कभी कभी मैं भी बच्चे को देखती तो सोचती इस सारे फेर में इस बच्चे का क्या कसूर है. कितना मासूम और खूबसूरत है. मेरा ... |
लेकिन मनुष्य जैसा है, वैसा ही उस परम को जान नहीं सकता। इससे ही दुनिया में नास्तिक दर्शनों का जन्म हो सका। जैसे अंधा आदमी प्रकाश को जानना चाहे, न जान सके, तो अंधा आदमी भी कह सकता है कि प्रकाश एक भ्रांति है। और जिन्हें प्रकाश दिखाई देता है, वे किसी विभ्रम में पड़े हैं, किसी इलूजन में पड़े हैं। जो प्रकाश की बात करते हैं, ... |
ों में आदमी ने नहीं की थीं। आदमी की ये उपलब्धियां उसके अहंकार को बल देती हैं। वह बीमारी से लड़ सकता है। वह उम्र को भी शायद थोड़ा लंबा सकता है। उसने बिजली को बांधकर घर में रोशनी कर ली है। उसके पूर्वज बिजली को आकाश में देखकर कंपते थे और सोचते थे कि इंद्र नाराज है। उसने बिजली को बांध लिया है। अगर पुरानी भाषा में कहें, तो ... |
तर्क के भीतर आ जाता है, बुद्धि समझ सकती है।
विज्ञान बुद्धि का विस्तार है। इसलिए वितान उसी को मानता है, जो नप सके, जांचा जा सके, परखा जा सके, छुआ जा सके, प्रयोग किया जा सके, उसको ही। जो न छुआ जा सके, न परखा जा सके, न पकड़ा जा सके, न तौला जा सके, विज्ञान कहता है, वह है ही नहीं ।
वहां विज्ञान भूल करता है। विज्ञान को इतना ... |
ी प्रकाश के कारण है ।
अंधे का पूरा जीवन प्रकाश में लिप्त है, प्रकाश में डूबा है। अगर प्रकाश न हो, तो अंधा नहीं हो सकता। लेकिन फिर भी अंधे को प्रकाश का कोई भी पता नहीं चलता है। क्योंकि जो आंख चाहिए देखने की, वह नहीं है। अंधा जीता प्रकाश में है, होता प्रकाश में है, लेकिन अनुभव में नहीं आता।
हम भी परमात्मा में हैं। उसके ब... |
खों से देखा है, वे इस भ्रांति में न पड़े कि उन्होंने कृष्ण को देख लिया। अभी तक अर्जुन ने भी नहीं देखा है। उनके साथ रहा है। दोस्ती है। मित्रता है। पुराने संबंध हैं। नाता है। अभी उसने कृष्य को नहीं देखा है। अभी उसने जिसे देखा है, वह इन आंखों, प्राकृत आंखों और अनुभव के भीतर जो देखा जा सकता है, वही। अभी उसने कृष्य की छाया ... |
नी बन जाना चाहिए।
लेकिन बड़ी मुश्किल है। तोड़े, तो सिर्फ हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलती है। जोड़े, तो पानी नहीं बनता। जोड्ने के लिए बिजली की मौजूदगी जरूरी है। और बिजली उस जोड़ में प्रवेश नहीं करती, सिर्फ मौजूद होती है, जस्ट प्रेजेंट। सिर्फ मौजूदगी चाहिए बिजली की बिजली मौजूद हो, तो हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी बन जाता है... |
मियाँ आजाद के बारे में, हम इतना ही जानते हैं कि वह आजाद थे। उनके खानदान का पता नहीं, गाँव-घर का पता नहीं खयाल आजाद, रंग-ढंग आजाद, लिबास आजाद दिल आजाद और मजहब भी आजाद। दिन भर जमीन के गज बने हुए इधर-उधर घूमना, जहाँ बैठना वहाँ से उठने का नाम न लेना और एक बार उठ खड़े हुए तो दिन भर मटरगश्त करते रहना उनका काम था। न घर, न द्व... |
मियाँ आजाद मुँह-अँधेरे तारों की छाँह में बिस्तर से उठे, तो सोचे साँड़नी के घास-चारे की फिक्र करके सोचा कि जरा अदालत और कचहरी की भी दो घड़ी सैर कर आएँ। पहुँचे तो क्या देखते हैं, एक घना ...Read Moreहै और पेड़ों की छाँह में मेला साल लगा है। कोई हलवाई से मीठी-मीठी बातें करता है। कोई मदारिए को ताजा कर रहा है। कूँजड़े फलों ... |
ियाँ आजाद अपने एक दोस्त के साथ सैर करते हुए बस्ती के बाहर जा पहुँचे। क्या देखते हैं, एक बेल-बूटों से सजा हुआ बँगला ...Read Moreअहाता साफ, कहीं गंदगी का नाम नहीं। फूलों-फलों से लदे हुए दरख्त खड़े झूम रहे हें। दरवाजों पर चिकें पड़ी हुई हैं। बरामदे में एक साहब कुर्सी पर बैठे हुए हैं, और उनके करीब दूसरी कुर्सी पर उनकी मेम ... |
खा गच्चा खा गए, अब बिना इनाम दिए गला न छूटेगा। बस, अलारक्खी की भड़कीली दुलाई उठाकर दे दी। बहुरूपिए ने दुलाई ली, झुक कर सलाम किया और लंबा हुआ। लौंडे ने देखा कि मैं ही रहा जाता हूँ। बढ़ कर आजाद का दामन पकड़ा। हुजूर, हमें कुछ भी नहीं? आजाद ने जेब से एक रुपया निकाल कर फेंक दिया। तब अलारक्खी चमक कर आगे बढ़ीं और बोलीं - हमें... |
े नहीं होते?
दूसरे दिन नौ बजे रात को नवाब साहब और उनके मुसाहब थिएटर देखने चले।
नवाब - भई, आबादीजान को भी साथ ले चलेंगे।
मुसाहब - जरूर, जरूर उनके बगैर मजा किरकिरा हो जायगा। इतने में फिटन आ पहुँची और आबादीजान छम-छम ...Read Moreहुई आ कर मसनद पर बैठ गईं।
नवाब - वल्लाह, अभी आप ही का जिक्र था।
आबादी - तुमसे लाख दफे कह दिया क... |
बना कर छोड़ते।
इतने में सामने एकाएक एक घसियारा घास का गट्ठा सिर पर लादे, पसीने में तर आ खड़ा हुआ और खोजी से बोला - हुजूर, घास तो नहीं चाहिए?
मियाँ आजाद मिरजा साहब के साथ जहाज की फिक्र में गए। इधर खोजी ने अफीम की चुस्की लगाई और पलंग पर दराज हुए। जैनब लौंडी जो बाहर आई, तो हजरत को पिनक में देख कर खूब खिलखिलाई और बेगम ...... |
- अब लौंडी वहाँ नहीं जाने की।
शाहजादा - पहले मतलब की बात तो बताओ कि हुआ क्या?
हुस्नआरा और सिपहआरा, दोनों रात को सो रही थीं कि दरबान ने आवाज दी - मामा जी, दरवाजा खोलो।
मामा - दिलबहार देखो कौन पुकारता है?
दिलबहार - ऐ वाह, फिर खोल क्यों नहीं देतीं?
मामा - मेरी उठती है जूती ...Read Moreभर की थकी-माँदी हूँ।
दिलबहार - और यह... |
ें एक बड़े गरांडील जवान को गुजर हुआ है। कद कोई आध गज का हाथ-पाँव दो-दो माशे के हवा जरा ...Read Moreचले, तो उड़ जायँ। मगर बात-बात पर तीखे हुए जाते हैं। किसी ने जरा तिर्छी नजर से देखा, और आपने करौली सीधी की। न दीन की फिक्र थी, न दुनिया की, बस, अफीम हो, और चाहे कुछ हो या न हो।
रात के ग्यारह बजे थे, चारों बहनें चाँदनी का ल... |
सुपर मॉन्स्टर्स! नई कक्षा! कक्षा बहुत अच्छी लग रही है! नए सुपर मॉन्स्टर्स को बहुत पसंद आएगी! हम उनका स्वागत करना चाहते हैं।
बहुत सजावट करनी चाहिए।
पकड़ लिया! बचा लिया।
तुम ज़रूर लोबो हो।
हाँ! और आप ज़रूर मिस मीना होंगी।
नई कक्षा को पढ़ाऊँगी।
सुनो, दोस्तों, नई टीचर आ गईं! हेलो, मिस मीना! हेलो, सुपर मॉन्स्ट... |
ँगी।
और एक राष्ट्रपति! एक राजकुमारी राष्ट्रपति! रॉकी, पकड़ो! रुको! मैं तैयार नहीं हूँ! एक अति बहादुर सुपर मॉन्स्टर के लिए है।
और मुझ में बहादुरी कुटकुट कर भरी है।
अरे।
मैं पहुँच क्यों नहीं पा रहा?
मुझे ग़ुस्सा आ रहा है! मुझसे एक चीज़ ठीक से नहीं होती! ना तेज़ उड़ पाता हूँ। ना ऊँचा।
कोई बात नहीं।
तुमने पूरी ... |
ारे साथ बाँट सकूँ।
और आप चिंता मत करो।
घर जाने की कोशिश नहीं करूँगी।
और सबसे अच्छी टीचर के साथ! हाँ! वापस स्वागत है! बिलकुल सही समय पर।
जो हमने अब तक नहीं किया रिसेस! वाह! काफ़ी रोमांचक रही! वाक़ई! शायद हम सबने बहुत कुछ सीखा।
मैंने तो सीखा।
मैं बहुत ख़ुश हूँ, मेरे नए दोस्त बने! और पता है सबसे अच्छी चीज़ क... |
र शक्तियों को बेहतर कर सकें।
आपका मतलब, ऐसे?
वाह! फ्रैंकीमैश, मॉन्स्टरस्मैश!
हाँ!
अच्छा!
इसका मतलब जाने का समय हो गया।
स्पाइक, वीडा, क्लियो, लोबो...
एक नए कारनामे के लिए तैयार?
नया कारनामा?
मुझे लगा हम मिस्टर गैबमोर को
मिलने म्यूज़ियम जाएँगे।
वहीं जाएँगे।
म्यूज़ियम में मज़ा आएगा पर वह नया नहीं है।
सही कहा।... |
़ करना, सैमी।
आ जाओ, विंगोट।
रॉकी के पास आओ।
लगभग पकड़ ही लिया था!
मुझसे कोई भी काम नहीं होता।
कोई बात नहीं, रॉकी।
काश मैं रॉकी की मदद कर पाती!
माफ़ करना।
मैं ग़ुस्से को काबू नहीं कर पाया।
कोई बात नहीं, रॉकी।
हम सब कभीकभी परेशान हो जाते हैं।
कहानी कौन सुनना चाहेगा?
कहानी सुनाने में क्या गड़बड़ हो सकती है?
... |
जो हमने अब तक नहीं किया...
रिसेस!
वाह!
हमारा समय कितना अच्छा बीत रहा है
हैरान हूँ क्याक्या करूँ
यहां सब कमाल का है
तुम्हारे साथ खेलना कितना मज़ेदार है
दोस्ती तोहफ़ा लगती है
दोस्त की मदद करने से सुकून मिलता है
मेरा समय कितना अच्छा बीत रहा है
हमेशा करने को कुछ नया है
सबसे अच्छा समय
हैरान हूँ तुम क्याक्या करत... |
टुकड़ी के साथ एक एजेंट हाथी दाँत की पहरेदारी कर रहा था; पर जंगल की गहराई में, काँपती लाल किरणें गहरे काले रंग की स्तंभों जैसी बिखरी आकृतियों के बीच उठती गिरती लग रही थीं और उन शिविरों की स्थिति दिखला रही थीं, जहाँ मिस्टर कुर्ट्ज़ के भक्त बेचैनी के साथ चौकीदारी कर रहे थे। नगाड़े की एकरस आवाज़ हवा में दबे-दबे झटके और निर... |
पर यथार्थ में उसका सामना करते हुए मैं होश में वापस आया। मैंने खतरे के असली फैलाव को जाना। अभी तक हम खतरे से बाहर न थे। अगर वह शोर मचाए तो? उससे खड़ा तक न हुआ जा रहा था, पर उसकी आवाज़ में अब भी खासा दम था। 'भागो छिपो, ' उसने अपनी गंभीर आवाज़ में कहा। आवाज़ में आतंक था। मैंने पीछे देखा। बिल्कुल पास की धूनी हमसे तीस गज से... |
दिया, मैंने अपना माथा पोंछा। मेरी टाँगें काँप रही थीं, मानो मैं आधा टन वजन ढोते उस चट्टान से उतरा था, जबकि मैंने उसे बस सहारा भर दिया था। उसकी हड्डियों सी दिखती बाँह मेरी गर्दन पकड़े हुए थी और उसका वजन एक बच्चे से ज्यादा न था।
अगले दिन मध्याह्न को जब हम चले, अभी तक दरख्तों के पीछे की जिस भीड़ का तीखा अहसास हर वक्त मुझम... |
क प्रेम, और उनकी वजह से जिन रहस्यों की जड़ों तक वह गया, उनके प्रति अलौकिक नफ़रत, दोनों ही उस अघायी आत्मा को वश करने के लिए जूझ रहे थे, जो झूठी शोहरत, बनावटी फर्क और सफलताओं और ताकत के सभी दिखावों के लिए लालायित, आदिम भावनाओं से भरपूर थी।
कभी-कभी वह तिरस्कार लायक बचकानी हरकतें करता। वह माँग करता कि उन भयंकर अनजान इलाकों... |
ा। पर मैं ज्यादा नहीं खा पाया। शुक्र यह कि वहाँ एक दिया था बत्ती, है न भयंकर, भयंकर अँधेरा था। मैं उस कमाल के शख्स के पास फिर से नहीं गया, जो धरती पर अपनी आत्मा के दुःसाहसों पर अपनी राय सुना चुका था। वह आवाज़ जा चुकी थी। और वहाँ क्या बचा था? वैसे मुझे यह मालूम है कि अगले दिन एक कीचड़ भरे गड्ढे में एजेंटों ने कुछ दफनाया... |
गे शरीफ़ लोगों पर कड़वी हँसी हँसता रहा। मानता हूँ कि मेरा व्यवहार बदतमीज़ी कहलाएगा, पर उन दिनों मेरी तबियत शायद ही ठीक रही हो। मेरी तबियत को दुरुस्त करने के लिए' मेरी मौसी की कोशिशें नाकामयाब थीं। दरअसल मेरी तबियत नहीं, मेरी सोच को इलाज की ज़रूरत थी। कुर्ट्ज़ ने जो कागज़ात |
वह निष्प्रमाणित भी नहीं हुआ है, कारण, आधुनिक विज्ञान न तो मानव-अन्तरात्माके पूर्वजीवनके बारेमें कुछ जानता है, न उत्तरजीवनके बारेमें, वस्तुतः वह तो अन्तरात्माके वारेमें कुछ भी नहीं जानता और न जान ही सकता है, उसका क्षेत्र मांस, मस्तिष्क और स्नायु भ्रूण और उसकी रचना तथा विकासतक ही सीमित है । फिर, आधुनिक आलोचकके पास कोई ऐस... |
यह कहनेका अवकाश रहता है कि वे यथार्थतः स्मृतियाँ नहीं हैं, प्रत्युत कहनेवालेको सामान्य स्थूल साधनों द्वारा ज्ञात थीं या दूसरों द्वारा भुझायी गयी थी और उसने उन्हें या तो चेतन प्रवंचना द्वारा या आत्म-प्रवंचना और आत्म-विभ्रमकी किसी प्रक्रिया द्वारा पिछले जन्मोंकी फिरसे साकार हो उठी निर्दोष स्मृतिमें परिवर्तित कर दिया है। ... |
कते। अभी तक जो भी बाह्य साक्ष्य प्राप्त है वह बिलकुल ही प्रारम्भिक है। पाइथागोरस महानतम मुनियोंमेंसे थे, परन्तु उनका यह कथन कि वह द्रवायमें लड़नेवाले एंटिनोरिड नामक व्यक्ति थे और एत्रियसके कनिष्ठ पुत्र द्वारा मारे गये थे दावा मात्र है, और उनका ट्रवायकी ढालको पहचानना किसी ऐसे व्यक्तिको विश्वास न दिला सकेगा जो पहलेसे ही ... |
हम भले आदमीकी पहचान और उसके भलेपनका माप भी इसके द्वारा कर सकें कि उसे अपने पेटमें डालनेके लिये कितना घी मिलता है और बैंकमें वह कितने खनखनाते रूपये जमा कर सकता है और उसे कौन-कौनसे विभिन्न सौभाग्य प्राप्त हैं, -- कारण, क्यां परमेश्वरको कड़ा और सम्माननीय लेखाकार नहीं होना चाहिए ? हाँ, और यह भी कितना सुखकर होगा यदि हम दुष... |
ह बात असह्य है कि दिव्य सामर्थ्यवाला मनुष्य पुरस्कारके लिये पुण्यात्मा बने और भयके कारण पापको छोड़े। स्वार्थी कायर या ईश्वरके साथ क्षुद्र मोलतोल करने
वालेकी अपेक्षा सवल पापी होना बेहतर है; उसमें अधिक दिव्यता होती है, ऊपर उठनेकी अधिक क्षमता होती है । गीताने सत्य ही कहा है, कृपणाः फलहेतवः । और यह अकल्पनीय है कि इस विशाल ... |
क्रियाशीलताके उन विशेष रूपोंको स्मरण करता है जिन्होंने उसके वर्तमान उपादानोंको निर्मित किया है, और यह जानता है कि वह अविच्छिन्न भविष्य में विकास द्वारा किसकी ओर बढ़ रहा है । यही पुनर्जन्ममें सच्चा सक्रिय विश्वास है, और यहाँ भी प्रश्नकारिणी बुद्धिकी क्रीड़ा वन्द हो जाती है; अन्तरात्माकी दृष्टि और अन्तरात्माकी स्मृति ही ... |
ी वह एचिलिस ही है, वही व्यक्तित्व है जिसने पुनर्जन्म ले लिया है, केवल शारीरिक परिस्थितियाँ भिन्न है । पुनर्जन्मके सिद्धान्तमें एक ही व्यक्तित्वका इस प्रकार उत्तरजीवी होना ही आजके यूरोपीय मनको आकर्पित करता है; कारण, व्यक्तित्वका, इस मानसिक, स्नायविक और शारीरिक सम्मिश्रणका, जिसे हम अपना आपा कहते हैं, विलोपन या विघटन सहना... |
तो वह अमरताको स्वीकृत जैसा मान लेता है, जैसा कि उस दूरस्थ लोकमे स्थित होनेसे वह अवश्य करेगा। वह जिस ज्ञानकी माँग कर रहा है, उसमे वह गभीरतर, सूक्ष्मतर समस्या समाविष्ट है जिसके बारेमे यमका कथन है कि पुरातन कालमे देवोने भी इस विषयपर विवाद किया था और इसे जानना आसान नही है, क्योकि उसका धर्म सूक्ष्म है, कोई ऐसी वस्तु उत्तरजी... |
म्बित और स्वीकार करता है ? वास्तवमे एक अक्षर आत्मा, एक सत्-व्यक्ति होता है जो इस सदा - परिवर्तनशील व्यक्तित्वका अघिपति है, और फिर यह व्यक्तित्व सदा-परिवर्तनशील शरीरोको धारण करता है, परन्तु सदात्मा सदा ही अपने वारेमे यह जानता है कि वह क्षरसे ऊपर है, वह उसे देखता और उसका भोग करता है, परन्तु उसके अन्दर उलझता नही । वह क्या... |
रात में कुम्हार को भूख नहीं थी। पत्नी के बार-बार कहने पर उसने एक रोटी खाई और ढेरों पानी चढ़ा लिया। इस पर पत्नी नाराज़ हुई। उसने पत्नी की नाराज़गी पर ज़रा भी ध्यान न दिया। सीधे खाट पर पड़ गया। लेटते ही उसकी आँख लग गई लेकिन थोड़ी ही देर में वह जाग गया। उसे अजीब-सी बेचैनी हो रही थी। मन में बार-बार यह ख़्याल आ रहा था कि कह... |
में आँचल ठूँसे रो रही थी। माँ के लिए वह रो रही थी, इसी के साथ कुम्हार को अकेला छोड़ने का दुःख भी उसे साल रहा था। वह बीमार था, अभी-अभी तो ठीक हुआ- उसे छोड़ के कैसे जाए? सोच-सोचकर बेहाल हुई जा रही थी वह।
कुम्हार ने अवध से पूछा - क्या हुआ जिया को?
सास को वह जिया कहता था। हालाँकि सभी उसे जिया कहके पुकारते थे।
अवध ने कहा - ... |
ुहार की क्या ज़रूरत? लोग अपने आप आ रहे हैं, सामान ख़रीद रहे हैं, फिर भी गुहार! यह गुहार लगातार तेज़ होती जाती। जैसे-जैसे रात घनी होती जाती गुहार और भीड़ ढलान पर होती जाती। धीरे-धीरे भीड़ छँटने लग जाती। सब्जी बेचनेवाले ही रह जाते। गैस-बत्तियाँ बुझाई जाने लगतीं। और फिर सामान बँधने लग जाते। ठेलों को एक लाइन में बाँधना शुर... |
ी और से तो नहीं। इसमें हरज क्या है? फिर अवध ने भी तो आने के लिए इसरार किया था, कई बार बोला था- यह तर्क देकर वह लेटा और विचार बना लिया कि कल सुबह वह घर से निकलेगा और सीधे ससुराल के लिए चल देगा। वैसे ससुराल है भी कितनी दूर। कुल मिलाकर दस किलोमीटर। पाँचों पीरन के पास!
अलसुबह जब झीना उजास फैल रहा था, कुम्हार को नींद लग गई।... |
ार सब जानते हुए भी अनजान बना रहा, प्लास्टिक के गिलासों की गिनती करने में उलझा था। पत्नी ने गौरी के यहाँ से जाने की ख़बर दी तब भी वह कुछ नहीं बोला। बोलकर भी क्या करेगा वह?
शाम को गोपी श्यामल के घर से लौटा तो आँखों में आँसू भरे, बेआवाज़ रो रहा था।
माँ ने अनजान बनते हुए पूछा - क्या हो गया बेटा?
गोपी यकायक ज़ोरों से रो पड़... |
ा हुआ था- क्या करे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बाज उस पर क्यों झपट्टा मार रहा है? उसने क्या बिगाड़ा है उसका? वह निरीह भाव से मुस्कुराया और कुम्हार की ओर देखने लगा जैसे उसी से यह प्रश्न कर रहा हो।
कुम्हार जानते हुए भी अनजान बना रहा और यह कहने लगा- बैठें हुजूर, बाज-फाज से क्या डरना, पंछियों की भला किसी से क्या अदावत होगी... |
, अपना काम निपटा। बड़े मियां को खुल्ला छोड़ दे, इधर-उधर चर लेगा। कुछ तो पेट भरेगा उसका।
सार में बड़े मियां पीठ खुजला रहे थे, कुम्हारिन को देखते ही बोले- ये पटवारी जानहार दरवज्ज़े पे काहे खड़ा है जमदूत की तरह। कई दिनों से इसे देख रहा हूँ, चक्कर काटते।
-मुझे नहीं पता, इनसे पूछ तू।
-मुझे तो इसकी आँखों में बदमाशी दीखती है।... |
कहा - अभी तू परेशान न हो, घर में देख ले, सब मिल जाएगा।
पटवारी ने सान्त्वना के अंदाज में कहा- हम तो काग़ज़ देना नहीं चाह रहे थे, वैसे यह तेरे नाम है भी नहीं, आम जनता के नाम है, आडर है, सूचना है। हम कई दिनों से टालते आ रहे थे कि किसी तरह बात टल जाए, लेकिन क्या है, ऊपर का फरमान है। हम कितने दिन इसे दबा सकते हैं, जितने दिन... |
अनिल जनविजय (चर्चा । योगदान)
(नया पृष्ठः {{GKGlobal}} {{GKRachna ।रचनाकार=सत्यनारायण पटेल }} Category:कहानी <POem> फूँऊँ.ऽ..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ.....)
(कोई अंतर नहीं)
यह शंख की ध्वनि थी- न सिर्फ़ मन्दिर से डूँगा के कान तक बल्कि गाँव के कोने-कुचाले तक पसरी और लम्बी। गन्धहीन और अदृश्य। ध्वनि भी क्या! बस, शंख के पिछवाड़े़ में फूँकी... |
ना सोखने की कुबत न रह जाती और पसीने का आना ज़ारी रहता। तब फतवी से रिसता पसीना भी धोती में ही समाता। असल बात यह कि डूँगा की धोती बड़ी कलेजेदार थी। वह अपने भीतर पसीने की कितनी ही धाराओं को समा लेती और पुर नहीं आती। डूँगा की धोती, मानो धोती नहीं थी। उसकी कमर के आसपास लिपटा पूरा समुद्र थी।
पंडित हाथ में आरती की थाली लिये थ... |
रा के लिए भी एक-एक खाट बनवा ली जाये। खाट की ईंस और पाए तो अपने खेत के एक पेड़की कुछ डगाले कटवाकर गाँव के सुतार बा से गढ़वा लिये थे। खाट बुनवाने को रस्सी लाना थी और नरेटी ख़रीदने जितने पैसों का बन्दोबस्त था, सो खाट बनवाने के ख्याल में कोई खोट नहीं थी। जब पारबती की खाट बनकर तैयार हो गयी और पवित्रा की खाट में रस्सी बुनवान... |
समझ में न आये। रात बीती जाये। लेकिन फिर देर रात में ही सही, पर वजह उसके हाथ लग ही गयी। वहज वही थी कि भूल से तकिया बदल गया।
डूँगा ने घर में सोयी पारबती और पवित्रा को जगाने का सोचा और तकिया लेकर खाट पर उठ बैठा। आसमान में तीन तारों की छड़ी की ओर देखा, छड़ी, 'जिसे वह अपनी सपनों की लुगड़ी में सोने का तार समझता था। उसी से ट... |
लटी गंगा बहाने पर तूला है।
उन्होंने एक रात दायजी को खेत पर करंट लगाकर मार दिया। जब दायजी का नुक्ता-घाटा हो गया, उन्होंने वे खेत कब्जा लिये। डूँगा की जी ने जैसे-तैसे उसे बढ़ा किया और ब्याह के साल-छः महीने बाद ही वह चली गयी। उसे कोई बीमारी थी, ये तो कभी कुछ उजागर न हुआ। पर उसकी उम्र और पड़ौस की सम्पत की, बाखल की और दूसरी... |
दर्द था। लेकिन जब थाली में अपना मन पसंद भोजन देखा, तब दर्द तो भूला ही, भूला खाने से पहले हाथ धोना भी, और दोनों साथ-साथ खाने लगे।
खाने के बाद फिर सिर में दर्द ने आँखें खोली और धीरे-धीरे चटीके पड़ने लगे। वहीं सामने वाली भीत से सटी अनाज से भरे थैलों की थप्पी लगी थी। कुछ दिन पहले ही आयी ताज़ी फ़सल को अवेरकर रखी थी। बेंचना... |
पारबती की देख-भाल, अपनी सगी बेटी की तरह की थी।
जब अस्पताल से पारबती को छुट्टी दी। तब डाॅक्टर ने डूँगा को अपने केबिन में बुलाकर समझाया- पारबती का केस कुछ ज़्यादा बिगड़गया था। उसकी कोंख बिल्कुल ख़राब हो गयी। अब वह दुबारा माँ नहीं बनेगी।
सुनकर डूँगा को दुख तो हुआ था। एक क्षण को उसके ज़ेहन में कौंधा- पढ़ा-लिखा होता, या षह... |
दुख और सहानुभूति प्रकट करने लगी। बचे हुओं को, जाने वालों के ग़म से उभारने का सोच ढाँढ़स बँधाने लगी। जीभ जैसे ही मसूड़ों पर चलकर अगले दाँत के पास पहँुचती। कोई अकड़कर और कोई विन्रमता में अपनी जगह खड़ा रहता। कोई रूठकर पीछे हट जाता। जैसे जता रहा हो- मैं ज़्यादा दिन रुकने वाला नहीं।
फिर वह अपनी जगह खड़ा-खड़ा ही हँसा। सचमुच ... |
सी) लागे।
-कसीज (कैसी) ? पारबती जैसे क्षणभर को ख़ुद को भूल गयी, ऐसे देखती बोली थी।
-जैसी पहली बार गेहूँ का खळा (खलिहान) में लागी थी। डूँगा ने उसकी आँखों को अपनी आँखों से सेंकते हुए कहा था।
डूँगा ने उन दिनों की याद दिलायी, जब वह ब्याह के बाद पहली बार ससुराल आयी थी। कुछ दिन तो उसे डूँगा की माँ अपने साथ ही सुलाती रही थी। ... |
अपनी मोटरसायकिल पोंछ रहा था। डूँगा ने सोचा- कहीं जा रहा होगा। उसे इधर-उधर दौड़ने के अलावा काम भी क्या ? रोज़एक-दो लुगड़ी का तैल तो फूँक ही देता होगा !
साँझ को जब डूँगा लौटा। बैलगाड़ी को अपनी सेरी में थोबी। तब उसने किषोर के घर सामने नवी-नकोर कार खड़ी देखी। पहले तो उसने सोचा- किषोर के यहाँ कोई पावणा-पई (मेहमान-वगैरह) आय... |
की बालक, म्हारा से हाथ भर ऊँची हुई गयी। म्हारे तो इससे छुटपन में ही ब्याह दी थी। अन तमने खळा में जबड़य भी ली थी। पारबती ने कहा और खाट पर बैठ गयी। धीमें स्वर में बोली- सवेरे म्हारा पेर (मायका) चल्या जाओ। म्हारा भई मदन ने आज सम्पत काकी का फ़ोन पर म्हारे बतायो। कोई छोरो देख्यो है, तम भी देखी आवो।
-अच्छा, या तो अच्छी बात ... |
पैसे का ढेर देख, सोच रहा था- इतनी रकम में तो जाने कितनी लुगड़ी आ जाये। पर ये तो ऐसे ही खेल रहे हैं, जैसे मैं बचपन में राखी के ख्याल और ख़ाली आगपेटी खेला करता। उन दिनों तो आगपेटी भी कोई बिरला ही लाता, ज़्यादातर तो चूल्हों में राख के भीतर अँगार भार कर रखते थे।
थोड़ी देर में बाज़ी ख़त्म हो गयी। पूरे रुपये डूँगा का साला अप... |
ीं ईंट के टुकड़ों से भरी छोटी बोरी उठा ली। तकिये की काली चिकट खोल देख कर लगा, पेट में भरी बीयर और चिकन बाहर आ जायेंगे। उसने तकिया झटपट वापस रखा और उलटे क़दम आकर खाट पर बैठ गया।
तभी पारबती भी दोनों ढली खाट के सामने आकर नीचे आँगन में बैठ गयी और मदन के सामने पवित्रा के ब्याह की चिंता सरकायी। पवित्रा जो धारावाहिक देख रही थ... |
ोदते-खोदते। ढंग की एक लुगड़ी भी नी लय पाया। बुढ़ापा में तो गार के सुधार लो !
पारबती की बात से डूँगा तिलमिला उठा। चाय पिघला लोहा बन गयी और भीतर तक फफोले पाड़ती गयी। ढंग का एक ही तो सपना था डूँगा का। जिसकी ख़ातिर उसने कितने ष्याले, उनाले और बरसात लट्ठे की फतवी में काट दिये थे। उस क्षण उसे लगा- उसकी मेहनत पर पारबती का भरो... |
वहाँ-वहा,ँ डूँगा अँग्रेज़ी कवेलू लगा देता। टुल्लर ऐसा हर उस घर पर नहीं करता, जिसमें जवान छोरी रहती। उस घर के साथ करता, जो टुल्लर की लायी पार्टी के साथ सौदा नहीं करता।
डूँगा को सबसे पहले, इसी टुल्लर ने आॅफर दिया था कि खेत बेच दे। दस लाख रुपये बीघा के हिसाब से बिकवा रहे थे तब। पर नहीं बेचा, तो नहीं बेचा। उस वक़्त रामा बा... |
इमें।
दो साल से वह रामा बा के घर की एक अँधेरी ओड़ली में बंद है, पर रामा बा के घर के अलावा कोई नहीं जानता- वह ज़िन्दा है कि मर गयी। छोटी छोरी पवित्रा की तरह जवान हो गयी। पर उसके लिए न कोई रिष्ता आता, न कोई लाता। कोई भूला भटका आ जाता, तो उसे टुल्लर का कोई न कोई छोरा मिल जाता और उलटे पाँव भगा देता। टुल्लर ने ये अघोषित ऐल... |
न सब ठीक कर देइगो। पर जब उसे डूँगा ने बताया कि मदन भी ऐसे ही टुल्लर का साथी है, तो फिर वह चुप हो गयी।
वहीं बैठे किषोर के सामने अपनी ज़मीन का सौदा करते वक़्त आयी आफतें तैर गयी। काकी को भी वह सब याद आ गया- कैसे किषोर को घापे में लेकर ज़मीन का बयाना पकड़ाया ! कैसे सौदा चिट्ठी बनवायी ! षुरूआत में किषोर ने सख़्ती से ज़मीन ब... |
न्दोबस्त है ?
लम्बी नाक वाला बोला- पूरो बन्दोबस्त है। वह एक छोटी पन्नी में हड्डियाँ दिखाता- इ इका सरू तो भेली करी र्यो थो।
लीडर ने कहा- आज तो थारी खोपड़ी के मानी ग्यो यार।
दो जने गाड़ी से नीचे उतरे। एक ने गू के घोल की पोलीथिन पकड़ी, दूसरे ने हड्डियों की और डूँगा की खाट तरफ़बढ़े। कबरा देख रहा था। सतर्क था। पर भौंक नहीं ... |
की बुरी की तरह ही काट रही थी। पर वह काँप रहा था। कनपटियों से जैसे पसीने की नहीं, गाढ़ेख़ून की तिरपन रिस रही थी।
तभी षँख की ध्वनि उसे हमेषा की तरह बुलाने आयी। लेकिन डूँगा ने ध्वनि का आना। कान में प्रवेष करना। महसूस ही नहीं किया। पारबती घर में चूल्हा-चैका का काम करी रही थी। पवित्रा टी.वी. के सामने बैठी थी। डूँगा के मग़ज़... |
अचानक से आकाश में जैसे भटकी हुई बदलियों ने चमकते हुये चन्द्रमा के मुख पर अपनी चादर डाल दी तो पल भर में ही सारा आलम फैली हुई स्याही के रंग में नहा गया। इस प्रकार कि चारों तरफ फैला हुआ रात्रि का ये मनहूस मटमैला अंधियारा जैसे भांय-भांय सा करने लगा। कुशभद्रा शांत थी। उसके जल में फैली हुई चांदनी की कोमल किरणें अपना दम तोड़ ... |
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